बहुत आशाओं के साथ पड़ लिख कर , क्वालीफाइंग एग्जाम पास कर के आज वो दिन था ,जब हाथ में नोकरी का जोइनिंग लैटर था .खेर संविदा नोकरी थी पर आज जो इसे पाने की ख़ुशी थी तो आगे भविष्य का कुछ ख्याल नहीं आया ! फिर सोचा बाद में पड़ कर और कहीं अच्छी नोकरी मिल जायगी वैसे ये भी कोई बुरी नहीं थी ठीक ठाक सैलरी थी हर साल इन्क्रीमेंट का भी लिखा था और सरकारी है सरकार ऐसे ही थोड़ी रहने देगी अच्छा ही करेगी , हमने सुना भी था काफी क सरकारी नोकरी बड़े किस्मत वालों की मिलती है । बस फिर क्या था , नोकरी ज्वाइन करने की देर थी ।अगले ही दिन जाकर नोकरी पर जाने लगे ।
धीरे धीरे काम का लोड बढता रहा , दिन रात शिफ्ट लगती रही पड़ने की खूब कोशिश करी के और कोई अच्छी जगह पर चले जायंगे पर समय कहा चला जाता पता ही नहीं लग पता । देखते ही देखते साल निकलते चले गए कुछ दिनों बाद परमानेंट नोकरी भी निकली पर पड़ने का तो समय ही नहीं था और नाहीं गत वर्षी का कोई एक्सपीरियंस काम आना था । क्यूंकि ऐसी कोई पालिसी ही नहीं थी सरकार के पास के जो पुराने लोग है एक्सपीरियंस वाले उहे कोई फायदा मिल सके ,एग्जाम भी दिया जितना हो सका उतना पड़ कर ,और अंत में वाही हुआ जो विचार मन में पहले ही अगये थे । कुछ नम्बरों से रहगये ।
चलो एक बात में मन में सोची चलो अभी ये नोकरी तो है ना हाथ में सरकार और कुछ तो करेगी , ऐसी कोई पॉलिसीस जो की हमारे हित में हो आयगी ,फिर कुछ बात बन जायगी ।और फिर लगे नोकरी करने में दिन रात ,समय फिर बितता गया । हर साल अप्रिसिअल फॉर्म भरते थे और सोचते थे सैलरी बढेगी पर कभी नहीं बड़ी ।नोकरी करते करते आज 3 साल होगये । फिर मन में एक डर पैदा हुआ की अब क्या होगा जिन्दगी भर ऐसे ही मजदूरी करना होगी जितना काम उतनी सैलरी और वो भी फिक्स , इससे तो अच्छा कही प्राइवेट कंपनी में नोकरी करलेता काम लेते पर इन्क्र्मेंट , प्रोविडेंट फण्ड ,हेल्थ इन्सुरेंस जैसी सुविधाएँ तो मिलती तो लगे फिर दिमाग दौड़ाने और अप्लाई करना चालू किया ।और स्थिति ये थी की वहा भी वो एक्सपीरियंस काम ना आया । वहा से भी निराशा प्राप्त होने लगी । देखते ही देखते घर की जिमेदारियों का बोझ भी बड़ने लगा ।अब स्थिति कुछ ऐसी थी की 3 साल पहले जहाँ थे आज भी वहीँ पर है । और काफी लोगो से चर्चा की तो पता लगा की कुछ लोग तो 10-15 सालो से ऐसे ही काम कर रहे हैं । ये सब सुन सुन कर और भी तकलीफ होने लगी की कहने को तो सरकरी हैं हम फिर भी स्थिथि किसी बंधवा मजदुर जैसी है ।
अब सोचा की चलो शाम शाम को कुछ और काम करलेना चाहिए , शाम को कुछ काम करके जो पैसा आयगा उससे थोडा घर में सपोर्ट हो जायगा ।पर नियम के अनुसार आपको कोई कार्य करने की अनुमति नहीं है बंधवा मजदूरी में और हेड क्वाटर पर भी रहना पड़ता है भले ही वो कोई दूर दराच वाला गाँव क्यों ना हो जहाँ पर कोई और साधन नहीं हो काम करने का । फिर भी हिम्मत ना हारते हुए पास ही के जिले में एक छोटासा कंप्यूटर का काम ढूंडा और शाम को फ्री होकर वहा जाना शुर किया लोड बढता रहा सुबह उधर शाम को इधर समय कहा जाने लगा पता ही नहीं चलता था ,मन में गलत गलत विचार आने लगे कहीं उस समय नोकरी की ख़ुशी ण हुई होति और ज्वाइन ना किया होता तो आज बहुत अच्छी जगह होते और अपने मित्रो को देख कर तो और घ्रणा होने लगती वो लोग तो अब बसने लगे थे अपने परिवार के साथ और यहाँ तो अभी तक कोई ठिकाना ही नहीं हैं । के आखिर आगे होगा क्या ।
ऐसी ही दिन चर्या रहती सुबह से शाम तक महनत करना पड़ता 2-3 जगह पर काम करना पड़ता जिस से की घर चल सके , पर हर कोई ये नहीं कर पता । फिर एक दिन पता लगा की सब लोग स्ट्राइक करने जारहे है ।
में अकेला नहीं सभी संविदा कर्मचारी त्रस्त हैं ऐसी जीविका से । सबने एकता दीखते हुए भोपाल में धरना दिया और विचार बना लिया की इस बार आर या पार की लड़ाई की जायगी । इसी तरह का सोषण चलता रहा तो कैसे हम लोग जियेंगे , हमारा भविष्य बिलकुल भी सुरक्षित नहीं है इस नोकरी में ।
वो जोइनिंग का दिन था और आज हरताल का पहला दिन उसी लगन और जोश के साथ हम धरना स्थल पर अगये , फिर सोचा इतनी पढाई लिखाई कर के भी अपना हक़ , यहाँ तक की वेतन वृधि के लिए भी हमे ऐसे टेंट लगा कर वेतन कटवा कर लड़ना होगा । जब इतने बाद बड़े घोटाले होते हैं तब कोई फिकर नहीं करता , इतना पैसे पानी की तरह कहा कहा खर्च करदिया जाता हैं सरकार द्वारा जब कोई ध्यान नहीं देता पर यहाँ कुछ संविदा कर्मचारी की थोड़ी सा वेतन ना बढाने के 100 कारण तयार रहते हैं अफसरों के पास ।
हरताल की योजना भी शांतिपूर्ण तरीके से की गयी थी , और उसके फल स्वरुप आज 10 दिन हो चुके हैं कोई हमको सुन ने को भी तयार नहीं और कारण ऐसे बाते जाते हैं की आप के कॉन्ट्रैक्ट में लिखा हैं की आप हरताल पे नहीं जा सकते , पर किसी को ये नहीं दीखता की कॉन्ट्रैक्ट में ये भी तो लिखा है की हर वर्ष आपकी वेतान वृधि की जायगी । यहाँ शांति पूर्ण तरीके से किस को क्या मिला है आखरी समय तब था जब गाँधी जी ने शांतिपूर्ण तरीके से इस देश को आजादी दिलाई थी पर अज कल हिंसा के ही उधारण दीखते हैं ( पटेल / जाट आरक्षण ) जहाँ पर 1-2 दिन के अंदर सरकार को झुक कर उनकी बातें स्वीकारना पड़ी , जितनो का नुकसान वहा पर लोगों ने किया उस धन से पुरे देश के संविदा कर्मचारी परमानेन्ट करदिये जा सकते थे पर इतना प्रबंध कोण करेगा इस देश में सबको अपनी पड़ी है आम आदमी की कोई नि सुनता नहीं कुछ करने देता हैं । बस एक आम आदमी की आवाज़ दबादी जाती है । और हम अभी भी गाँधी जी के पद चिन्हों पर चलते हुए अहिंसा से हमारी मांगो को मंगवाने के लिए लड़ते रहेंगे । और इस बार की लड़ाई एक तरफ़ होगी और जित हमारी ही होगी , क्यूंकि हम आखरी तक डंटे रहेंगे ।
इस बार तो हमको हमारा हक पाना ही है हमारे लिए और आने वाले संविदा करमचारीओं के लिए !
इस देश में जीने के लिए सहनशीलता चाहिए ! जो जितना सहन करेगा वो उतना बदलाव लाने की कोशिश करेगा ।
संविदा नोकरी से हरताल तक !!! एक अनुभव #continued 26.06.2016
आखिर जित राजनीती की हुई । हम लोग छोटे से कर्मचारी हैं , नहीं की राजनीतिज्ञ , और हार का पलड़ा भी उनकी और ही झुका होता है जिनको राजनीती नहीं अति । देश के हक़ की लड़ाई करते करते कई लोगो शहीद होगय पर कभी किसी ने हार नहीं मानी और हम भी लड़ते रहंगे सरकारे आयंगी सरकारे जायंगी । इतनी महनत कर के जो संघठन खड़ा हुआ था वो आज तितर बितर होगया है , और अब तो धीरे धीरे तानशाही का आलम आ गया है जब मन में अत है लोगो को निकल दिया जाता है । जिन लोगो को पहले जब योग्य मानकर बरसो कार्य करवया और पल भर में अप्रिसिअल के नाम अयोग्य घोषित कर के निकलना शुरू करदिया है । मानवाधिकार नाम की कोई चीज़ ही नहीं हैं जो लोग परमानेंट होकर काम से जी चुराते है , घुस खोरी करतें हैं सरकार उनको बिना किसी अप्प्रिसिअल के मोटे मोटे वेतन देने को तयार हैं पर जो व्यक्ति दिन रात महानत कर के विभाग के कार्य को गति प्रदान कर रहा हैं । वो अपने हक़ के लिए लड़ भी नहीं पा रहे है जहा पहले परमानेंट होने से लेकर कही मांगो क साथ जो संघठन खड़ा था । आज वाही बिखरा हुआ संघठन ऊन लोगो की नोकरी बचाने में लगा हुआ है , जो कुछ दिनों पहले जैसे तैसे म्हणत करके अपना पेट पलते थे । अब तो कई लोगो के पास तो कुछ काम भी नहीं रहा करने को जो भी बचा कुचा पैसा है वो भी कोर्ट की तारीखों में निकलने लगा हैं ।
और जो बचे हुए हैं मेरी तरह वो ये सोचने में लगे हैं की कुछ नया जुगाड़ करले जल्द से जल्द वर्ना जो आज कुछ लोगो के साथ हुआ है कई और के साथ भी हो सकता है । वैसे विभाग या सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता एक को निकल कर अगर आवेदन निकल भी दें तो हजारों फॉर्म अजयंगे । करोड़ो की कमाई होजयगी , और बेरोजगारी का अकड़ा भी केंद्र को कम दिखाया जायगा , जिनको पहले मिली थी उनको और जिनको अभी देंगे उनको सबका मिलाकर दिखाया जायगा ।
अब सिर्फ एक ही रास्ता है जो हम लोगो के पास बचा है इतने साल यहाँ पर बर्बाद करने के बाद , की या तो कोई नयी नोकरी ढूंड कर वहा चले जय सब समय महनत जो की आज तक को पराया कर के , या फिर से एक मजबूत संघठन को खड़ा कर के , उनलोगों को दिखाया जाय के हम हार मान ने वालो में से नहीं हैं । में दुसरे बिंदु पर ही विशवास करता हु और सब से आग्रह भी करता हु की जब धीरे धीरे कर के जाना सभी को ही (नोकरी छोड़ना ) है , तो क्यों ना एक बार और जंग लड़ी जाय और इस बार पूरी ताकत से एक मजबूत संघठन को खड़ा करके लड़ा जाये ।
नोकरी मायने नी रखती , आत्मसम्मान मायने रखता है दो वक्त की रोटी तो एक भिक मांग कर खाने वाला भी कम लेता हैं और हम लोग तो योग्य लोग हैं जो कम से कम अपने हक़ के लिए तो लड़ ही सकते हैं ।
इस कविता से हमे प्रेरणा लेनी चाहिए
लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है।
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है।
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है।
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में।
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो।
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम।
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।
--हरिवंशराय बच्चन जी

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