दोस्तों के साथ एक रोमांचक सफ़र ! अकाल्पनिक

रोमांचक सफ़र


रोमांचक सफ़र

हम लोगों ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिस सफ़र पर हम निकल रहे हैं, वह हमारी ज़िंदगी के यादगार सफ़रों में से एक बन जाएगा—ऐसा सफ़र जिसे हम कभी भूल नहीं पाएँगे।

आइए, पहले उन लोगों से आपको मिलवाता हूँ, जिनकी वजह से यह यात्रा और भी ज़्यादा रोमांचक बन गई।

नईमुद्दीन सर

हमारे फार्माकोलॉजी डिपार्टमेंट के डॉन। शाहरुख़ ख़ान के जबरदस्त फैन। पहले इप्का के लिए मार्केटिंग करते थे और अब मास्टर ऑफ़ फार्मेसी कर रहे हैं, लेकिन मार्केटिंग का भूत आज भी कभी-कभी उन पर सवार हो ही जाता है।
इनकी सबसे खास बात यह है कि जब तक ये चुप रहते हैं, दुनिया बहुत शांत लगती है; लेकिन जैसे ही बोलना शुरू करते हैं, फिर किसी के पापा भी इन्हें रोक नहीं सकते। और हाँ, ये जयपुर से हैं।

देवेंद्र

दूसरे नंबर पर आते हैं देवेंद्र। बाहर से शांत और सीधे-सादे लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर देते हैं कि सामने वाला सोच में पड़ जाए। ये ग्वालियर के रहने वाले हैं।

संदीप

तीसरे नंबर पर हैं संदीप—अफजलपुर, ज़िला मंदसौर से। काफ़ी समझदार हैं, लेकिन एक जगह आकर हर लड़के की तरह इनकी भी समझदारी थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है। जी हाँ, लड़कियाँ ही इनकी कमजोरी हैं। इसके अलावा इन्हें पूरी तरह समझदार कहा जा सकता है।

इमरान खान

चौथे नंबर पर हमारे इमरान साहब—ग्वालियर से। नवाबी शौक़ रखते हैं और आमतौर पर बड़ी समझदारी से पेश आते हैं। लेकिन जैसे ही किसी समझदार इंसान से बातचीत होती है, न जाने क्या हो जाता है—उलटी-सीधी बातें निकलने लगती हैं।

नंबर पाँच (सौरभ)

अब आते हैं हमारे नंबर पाँच पर—जो हर जगह अपनी पाँचों उँगलियाँ घी में चाहते हैं, चाहे मामला उनके कान का हो या किसी और का।
इनकी सबसे बड़ी बीमारी है डाउट—और वो भी पढ़ाई वाले नहीं, हर तरह के। हर चीज़ इन्हें दूसरों से ज़्यादा चाहिए। स्वभाव से बेहद भले हैं, कोई भी इन्हें आसानी से उल्लू बना सकता है। साथ ही ये बहुत सहायक भी हैं—हर किसी की मदद के लिए हमेशा तैयार।

और अब अपने बारे में क्या कहें—हम तो जैसे हैं, वैसे ही रहेंगे।


सफ़र की शुरुआत

हमारा सफ़र शुरू हुआ 18 दिसंबर 2012, सुबह 3 बजे। ट्रेन हमें मंदसौर स्टेशन से पकड़नी थी। सभी लोग समय पर पहुँच गए। वहाँ से हमें रतलाम जाना था।

ट्रेन में बैठते ही गप्पें शुरू हो गईं। न इधर देखा, न उधर। सुबह-सुबह यात्रियों की गालियाँ भी सुन लीं—
“सोने दो सालों, कहाँ-कहाँ से आ जाते हो!”
गुस्सा तो ऐसा आया कि पूछिए मत।

किसी तरह रतलाम पहुँचे। सुबह 5:30 बजे सीधे बजरंग वाले की दुकान पर चाय पी। अगली ट्रेन 7 बजे थी, तो वेटिंग रूम में जाकर टाइम पास किया और फिर ट्रेन पकड़ ली—जो हमें सीधे अंबाला कैंट ले जाने वाली थी।

ट्रेन में हमारी सीटों का जुगाड़ बड़ा दिलचस्प था—दो सीटें दूर थीं और चार एक साथ। इमरान, संदीप और मैं साथ बैठना चाहते थे, तो सौरभ और नईमुद्दीन को “सोने का बहाना” बनाकर दूर भेज दिया।

धीरे-धीरे आसपास के यात्रियों से जान-पहचान बढ़ी। रात को घर से लाया खाना खाया—हम दोनों ने जरूरत से ज़्यादा खाना पैक कर रखा था।

ठंड बढ़ने लगी थी, थकान भी थी, लेकिन दोस्तों के साथ होने से कुछ पता ही नहीं चला। सुबह 4 बजे ट्रेन हमें अंबाला कैंट पहुँचा गई।


अंबाला से चंडीगढ़

सुबह के चार बजे, कड़ाके की ठंड। मालवा क्षेत्र से आए हम लोगों के लिए ये बिल्कुल नया अनुभव था। आराम की कोई जगह नहीं मिली, तो वेटिंग हॉल में ज़मीन पर चादर बिछाकर सो गए। न शर्म थी, न झिझक—बस नींद थी।

करीब 9 बजे होटल ताज पहुँचना था। स्टेशन पर तैयार होकर बाहर निकले। फोटो सेशन शुरू हुआ—“मेरा फोटो खींच, मेरा खींच।”
नाश्ता करके बस में बैठे और एक घंटे में चंडीगढ़ पहुँच गए।

GPS की मदद से होटल ताज पहुँचे। कॉलेज की ब्लेज़र में ताज होटल में एंट्री—अलग ही एहसास था। अंदर पहुँचते ही एक मैडम आईं और बोलीं,
“आपका स्टॉल नंबर 3 है, जाकर सेटअप कर लीजिए। गवर्नर आने वाले हैं।”

हमारा पहला अनुभव था, और हम कुछ भी नहीं लाए थे—सिर्फ़ हम और हमारी ब्लेज़र। डर तो लगा, लेकिन जैसे-तैसे काम चलाया।

सेमिनार शानदार था—बड़े-बड़े साइंटिस्ट और रिसर्चर। हमारे लिए ये सब बहुत बड़ा अनुभव था।


चंडीगढ़, अमृतसर और देशभक्ति

चंडीगढ़ में हमने रोज़ गार्डन, रॉक गार्डन और सुखना लेक देखी। सामान ज़्यादा था, तो सौरभ को फिर से “जिम्मेदारी” दे दी।


थोड़ी देर बाद खबर आई—पुलिस ने सौरभ को रोक लिया!
ज़्यादा कुछ नहीं था, बस शक हुआ था। सब ठीक रहा।

वहाँ से अमृतसर के लिए ट्रेन पकड़ी। ठंड ने हालत खराब कर दी। सुबह करीब 3 बजे अमृतसर पहुँचे। गोल्डन टेंपल के लिए मुफ्त वाहन मिला और सुबह 4 बजे मंदिर पहुँच गए।


वहाँ की व्यवस्थाएँ—नहाने, रहने, खाने की—अद्भुत थीं। जितना सुना था, उससे कहीं ज़्यादा अनुभव मिला।
अंदर का माहौल—शांत, सुकून भरा, आध्यात्मिक।

इसके बाद वाघा बॉर्डर गए। वहाँ असली देशभक्ति का अनुभव हुआ—शब्दों में बयान करना मुश्किल है।


To be continued…







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