इम्तिहान की भी अब तो इम्तिहान होगी,
आँख खुली और बस रात हो गई।
इतनी थी ज़िंदगी से आस,
इतने थे आँखों में सपने,
पर बोझों तले वो भी काश हो गए।
इतना खो गया हूँ दुनिया की धूप में,
कि हर कदम पर सोचने लगा हूँ मैं—
कहाँ पता किस ओर जाऊँगा,
किस मोड़ पर खड़े होंगे मेरे सपने,
कैसे मैं उन्हें पाऊँगा।
जाना है उनके पार मुझे,
रुकना नहीं है अब मुझे।
मुझे छूटना है उन बातों से,
जिनमें इतना उलझने लगा हूँ मैं।
किस मोड़ पर खड़ा हूँ मैं…
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By : Vishal Sharma
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